इश्क़ का दर्द किसे सुनाएं

क्या लिखूं दास्ताँ अपने प्यार की बस इतना समझ लो दोस्तों

मैं डायरी का वो पन्ना हूँ जो कहानी पूरी होते ही फाड़ के फेंक दिया गया

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हिन्दू🚩🚩🚩

मित्रों बात थोड़ी पेचीदा है हमारे हिंदू धर्म में बहुत से मत मतअंतर है जैसे से कोई शिव को मानता है ब्रह्मा विष्णु को मानता है कोई कबीर को मान रहा है कोई गौतम बुद्ध को मान रहा है कोई महावीर स्वामी को मान रहा है कोई किसी गुरु जी को मान रहा है कोई किसी गुरु जी को मान रहा है वहीं उनकी भगवान शांति मिल रही है इसमें दिक्कत भी नहीं परंतु अब आप राम को माने और गौतम बुद्ध को गाली दे या फिर कबीर को माने और कृष्ण को गाली दे महावीर स्वामी को माने और शिव को गाली दे तो यह किसी प्रकार से सही नहीं है अंततः कहीं ना कहीं हम है तो हिंदू ही तो यह उचित नहीं है कि हम अपने मत को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के चक्कर में दूसरे मत को गाली दे क्यों ना हम जैसा कि भारत के बारे में कहा जाता है अनेकता में एकता कहां सिद्ध हो रही है एक तरफ दूसरा आदमी गाली दे रहा है दूसरे मत को क्यों न हम एकता स्थापित करें हम हर रोज टूटते जा रहे हैं हर रोज नए मत उत्पन्न हो रहे हैं ऐसा ना हो जाए कि हम अपने को यह साबित करें कि हम वही है जो नहीं है आप जिसको भी माने जैसे भी माने जिस स्थिति में माने परंतु यह माने कि मैं हिंदू हूं और दूसरे मतवाले से आप उसके भगवान का वर्चस्व मत पूछिए अस्तित्व मत पता कीजिए भगवान का अस्तित्व किसी को नहीं पता क्योंकि अभी हम इतने सिद्ध नहीं हुए हैं जो भगवान का अस्तित्व खोज लें और यह जो फेसबुक पर सोशल साइटों पर भगवान के अस्तित्व पर उठा देते हैं सवाल कि भगवान नहीं है यह उनके लिए मैं बस यही कहना चाहूंगा कि बेटा रंडी बाजी छोड़ कर भगवान में ध्यान लगाओ पता चल जाएगा कि भगवान है कि नहीं है पहले खोजने तो निकलो बाद में ना मिले तो आकर कहना कि भगवान नहीं है

गमों में सफर

ग़मों से यूँ वो फ़रार इख़्तियार करता था
फ़ज़ा में उड़ते परिंदे शुमार करता था

बयान करता था दरिया के पार के क़िस्से
ये और बात वो दरिया न पार करता था

बिछड़ के एक ही बस्ती में दोनों ज़िंदा हैं
मैं उस से इश्क़ तो वो मुझ से प्यार करता था

यूँही था शहर की शख़्सियतों को रंज उस से
के वो ज़िदें भी बड़ी पुर-वक़ार करता था

कल अपनी जान को दिन में बचा नहीं पाया
वो आदमी के जो आहाट पे वार करता था

वो जिस के सेहन में कोई गुलाब खिल न सका
तमाम शहर के बच्चों से प्यार करता था

सदाक़तें थीं मेरी बंदगी में जब ‘आकाश
हिफ़ाज़तें मेरी परवर-दिगार करता था

ओ देश से आने वाले🇮🇳🇮🇳

ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहां के बाग़ों में मस्ताना हवाएँ आती हैं?
क्या अब भी वहां के परबत पर घनघोर घटाएँ छाती हैं?
क्या अब भी वहां की बरखाएँ वैसे ही दिलों को भाती हैं?

ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वतन में वैसे ही सरमस्त नज़ारे होते हैं?
क्या अब भी सुहानी रातों को वो चाँद-सितारे होते हैं?
हम खेल जो खेला करते थे अब भी वो सारे होते हैं?

ओ देस से आने वाले बता!
शादाबो-शिगुफ़्ता1 फूलों से मा’ मूर2 हैं गुलज़ार3 अब कि नहीं?
बाज़ार में मालन लाती है फूलों के गुँधे हार अब कि नहीं?
और शौक से टूटे पड़ते है नौउम्र खरीदार अब कि नहीं?

ओ देस से आने वाले बता!
क्या शाम पड़े गलियों में वही दिलचस्प अंधेरा होता हैं?
और सड़कों की धुँधली शम्मओं पर सायों का बसेरा होता हैं?
बाग़ों की घनेरी शाखों पर जिस तरह सवेरा होता हैं?

ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहां वैसी ही जवां और मदभरी रातें होती हैं?
क्या रात भर अब भी गीतों की और प्यार की बाते होती हैं?
वो हुस्न के जादू चलते हैं वो इश्क़ की घातें होती हैं?

कभी जबां पर न आया

कभी ज़बाँ पे न आया के आरज़ू क्या है
ग़रीब दिल पे अजब हसरतों का साया है

सबा ने जागती आँखों को चूम चूम लिया
न जाने आख़िर-ए-शब इंतिज़ार किस का है

ये किस की जलवा-गरी काएनात है मेरी
के ख़ाक हो के भी दिल शोला-ए-तमन्ना है

तेरी नज़र की बहार-आफ़रीनियाँ तस्लीम
मगर ये दिल में जो काँटा सा इक खटकता है

जहाँ-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र की उड़ा रही है हँसी
ये ज़िंदगी जो सर-ए-रह-गुज़र तमाशा है

ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता
अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है

यही रहा है बस इक दिल के ग़म-गुसारों में
ठहर ठहर के जो आँसू पलक तक आता है

ठहर गए ये कहाँ आ के रोज़ ओ शब ‘अख़्तर’
के आफ़ताब है सर पर मगर अँधेरा है.

वो आशिक़ी के जमाने किधर गए💖💗💝💜

ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए
वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए

वीराँ हैं सहन-ओ-बाग़ बहारों को क्या हुआ
वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए

है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ
लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए

उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी
सूने हैं कोहसार दिवाने किधर गए

वो हिज्र में विसाल की उम्मीद क्या हुई
वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए

दिन रात मैकदे में गुज़रती थी ज़िन्दगी
‘अख़्तर’ वो बेख़ुदी के ज़माने किधर गए

जीवन का सत्य

किसी शायर ने मौत को क्या खुब कहा है;
. .. जिंदगी मे २ मिनट कोई मेरे पास ना बैठा.. , आज सब मेरे पास बैठे जा रहे थे.. .
. .. कोई तौहफा ना मिला आज तक.. , और आज फुल-ही-फुल दिये जा रहे थे.. .
. .. तरस गये थे हम किसी एक हाथ के लिये.. , और आज कंधे पे कंधे दिये जा रहे थे..

. .. दो कदम साथ चलने को तैयार न था कोई.. , और आज काफिला बन साथ चले जा रहे थे.. .
.
. .. आज पता चला मुझे कि “मौत” कितनी हसीन होती है.. . कम्बख्त. . . हम तो यूँही ‘जिंदगी’ जीये जा रहे थे.. . ………….!!